मैं आप सभी को सादर नमन करती हूँ।
मेरे प्रिय मित्र नवनीत ने जीवन की सच्चाइयों को लेकर बहुत सुंदर ब्लॉग्स लिखे हैं, जिनसे हमें आत्ममंथन का अवसर मिला।
आज मैं भी आपके सामने आई हूँ — अपने भाव, अपने अनुभव, और अपने कान्हा से जुड़े अपने प्रेम की अनुभूति आप सबके साथ बाँटने।

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर ‘प्रेम’ का, जो पढ़े सो पंडित होय।”

संत कबीरदास

यह दोहा केवल शब्द नहीं, मेरे जीवन की दिशा बन गया।

हमने जीवन भर ज्ञान, तर्क, शास्त्र और धर्म की बड़ी-बड़ी बातों को पढ़ा-सुना, परंतु जब ब्रजभूमि की गोद में जीवन प्रारंभ हुआ, तब इस ढाई अक्षर के प्रेम को मैंने बिना समझे ही जिया।

मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि मेरा जन्म ब्रज क्षेत्र में हुआ — वही पावन भूमि जहाँ वृंदावन, नंदगांव, बरसाना और गोवर्धन हमारे अपने थे। वहाँ संतों की वाणी, नागा साधुओं का तप, भागवत कथाएँ और रामायण पाठ जीवन का सामान्य अंग थे। परंतु उस समय शायद मुझे इसका मूल्य समझ नहीं आया।

और जब ब्रजभूमि से बाहर कदम रखा — तब पहली बार शांति के अभाव का अनुभव हुआ।
मन में हलचल थी, एक बेचैनी जो समझ नहीं आ रही थी।

जब यह बात मैंने माँ से कही, तो वह मुझे लेकर सीधे नंदगांव के टेर कदम्ब ले गईं।
वहाँ की निर्मल शांति, प्रकृति की गोद, और कान्हा की स्मृति ने मेरे अंतरमन को गहराई से छू लिया। वहीं से आरंभ हुआ — मेरे और श्रीकृष्ण के प्रेम का वास्तविक सफर।

भक्ति की इस यात्रा में एक दिन मन में प्रश्न उठा —
क्या केवल ब्रजवासी ही विरह में जले? क्या स्वयं श्रीकृष्ण ने भी कभी विरह का अनुभव नहीं किया?

हमें राधारानी, गोपियों और ब्रजवासियों के वियोग की अनेक गाथाएँ सुनाई गईं हैं, परंतु धीरे-धीरे जब संतों की वाणी और श्रीमद्भागवत का सच्चा रस मिला — तब जाना कि कान्हा भी उतने ही विरही थे

उद्धव के साथ संवाद, कुरुक्षेत्र में राधारानी से भेंट, और सबसे अधिक — जगन्नाथ जी का स्वरूप, इस बात का प्रमाण हैं कि कृष्ण का हृदय भी विरह की ज्वाला में तपता रहा

कहते हैं, जब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की कथाएँ सुनीं, तो प्रेम की आठवीं अवस्था को पार करते हुए वे स्वयं पिघल गए।
उस क्षण वे न भगवान रहे, न राजा — केवल प्रेममय ब्रजवासी कृष्ण बन गए।

तो प्रश्न उठता है — ब्रजवासियों ने ऐसा क्या किया जो स्वयं भगवान उनके अधीन हो गए?

उत्तर एक ही है —
उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रेम किया, निस्वार्थ भाव से,
न उन्हें भगवान माना,
न कुछ माँगा — न धन, न यश, न स्वर्ग
उन्होंने बस कान्हा से कान्हा को ही माँगा।
भक्ति की सर्वोच्च अवस्था यही है — जब प्रेमी अपने आराध्य को केवल प्रेम करता है, पहचानता नहीं, तौलता नहीं।

धन्यवाद्

जूही खंडेलवाल

2 responses to ““ढाई आखर प्रेम का – ब्रज और कृष्ण की मेरी यात्रा””

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    कई दिनों बाद हिन्दी में कुछ पढ़ने का अवसर मिला। अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए धन्यवाद जूही।

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    बहुत सुंदर और हृदयस्पर्शी भाव।

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